अगर आंखें धोखा न देतीं तो आज भारत के खिलाफ बॉर्डर पर होता ये खिलाड़ी, सिकंदर रजा की अनसुनी कहानी!
जिम्बाब्वे के स्टार ऑलराउंडर खिलाड़ी सिकंदर रजा की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है, उनका जन्म पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था।

The Untold Story of Sikandar Raza: क्या आप जानते हैं कि जिम्बाब्वेके कप्तान सिकंदर रजा कभी क्रिकेटर बनना ही नहीं चाहते थे? उनका सपना था पाकिस्तान एयर फोर्स में फाइटर पायलट बनना। अगर किस्मत ने साथ दिया होता तो शायद आज वह क्रिकेट के मैदान पर नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर लड़ाकू विमान उड़ाते नजर आते। लेकिन एक मेडिकल टेस्ट ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी और वहीं से शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जिसने उन्हें जिम्बाब्वे क्रिकेट का सबसे बड़ा सितारा बना दिया।
सिकंदर रजा का था फाइटर पायलट बनने का सपना
जिम्बाब्वे के स्टार ऑलराउंडर खिलाड़ी सिकंदर रजा का जन्म 24 अप्रैल 1986 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सियालकोट शहर में हुआ था। बचपन से ही वह पढ़ाई में अच्छे थे और पाकिस्तान एयर फोर्स के स्कूल में पढ़ते थे। उनका सबसे बड़ा सपना था कि एक दिन वह पाकिस्तान एयर फोर्स में फाइटर पायलट बनकर देश की सेवा करें।
आंखों की रोशनी ने पायलट बनने का सपना किया चकनाचूर
रजा ने एयर फोर्स में जाने के लिए कड़ी मेहनत की। उन्होंने शुरुआती परीक्षाएं भी पास कर ली थीं। लेकिन जब मेडिकल टेस्ट हुआ तो उनकी आंखों में एक समस्या सामने आई। विजन टेस्ट में वह पास नहीं हो सके और उन्हें उड़ान भरने के लिए मेडिकल रूप से अनफिट घोषित कर दिया गया। यही वह पल था जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
पिता के साथ जिम्बाब्वे जा पहुंचे सिकंदर रजा
फाइटर पायलट बनने का सपना टूटने के बाद सिकंदर रजा ने पढ़ाई पर ध्यान दिया। साल 2002 में उनका परिवार जिम्बाब्वे चला गया। वहां उन्होंने स्कॉलरशिप के जरिए पढ़ाई की और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इसके बाद सिकंदर रजा पढ़ाई के लिए स्कॉटलैंड की ग्लासगो कैलेडोनियन यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहीं क्लब क्रिकेट खेलते हुए उन्हें एहसास हुआ कि उनके अंदर क्रिकेट का भी शानदार टैलेंट है।
उधर उनके माता-पिता जिम्बाब्वे में अपना कारोबार शुरू कर चुके थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद रजा भी जिम्बाब्वे चले गए और वहां घरेलू क्रिकेट खेलना शुरू किया। लेकिन धीरे-धीरे यही शौक जुनून बन गया। उन्होंने अपनी बल्लेबाजी और ऑफ स्पिन गेंदबाजी से सबका ध्यान खींच लिया।
क्लब क्रिकेट से इंटरनेशनल तक
जिम्बाब्वे में उन्होंने क्लब क्रिकेट खेलना शुरू किया। शानदार बल्लेबाजी और उपयोगी ऑफ स्पिन गेंदबाजी की वजह से वह जल्द ही घरेलू क्रिकेट में पहचान बनाने लगे। 2013 में उन्हें जिम्बाब्वे की नेशनल टीम से खेलने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
सिकंदर रजा ने तीनों फॉर्मेट में जिम्बाब्वे के लिए शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने कई मैच अकेले दम पर जिताए और मुश्किल परिस्थितियों में टीम को संभाला। वह दुनिया के चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं जो बल्लेबाजी के साथ-साथ गेंदबाजी से भी मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं।
कप्तानी तक का सफर
लगातार बेहतरीन प्रदर्शन और अनुभव के दम पर सिकंदर रजा को जिम्बाब्वे टीम की कप्तानी सौंपी गई। आज वह सिर्फ कप्तान ही नहीं, बल्कि टीम के सबसे बड़े मैच विनर भी माने जाते हैं। उनकी कप्तानी में जिम्बाब्वे ने कई मजबूत टीमों को कड़ी टक्कर दी और विश्व क्रिकेट में अपनी पहचान मजबूत की।
भारत के खिलाफ भी दिखा दम
सिकंदर रजा ने भारत के खिलाफ भी कई यादगार पारियां खेली हैं। उनकी आक्रामक बल्लेबाजी और जुझारू रवैये की वजह से भारतीय टीम को भी कई मौकों पर कड़ी चुनौती मिली।
आज क्रिकेटर ना होते तो एयरफॉर्स में पायलट होते सिकंदर
यह कहानी यहीं सबसे दिलचस्प हो जाती है। अगर सिकंदर रजा एयर फोर्स के मेडिकल टेस्ट में पास हो जाते, तो शायद आज वह पाकिस्तान एयर फोर्स के अधिकारी होते। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच किसी सैन्य तनाव की स्थिति में उनका सामना भारतीय सेना या भारतीय वायुसेना से हो सकता था।
लेकिन किस्मत ने उन्हें युद्ध के मैदान की जगह क्रिकेट का मैदान दिया। अब वह भारत के खिलाफ जंग नहीं, बल्कि क्रिकेट मुकाबले खेलते हैं। यह एक काल्पनिक तुलना है कि उनका करियर किस दिशा में जा सकता था; वास्तविकता में उन्होंने क्रिकेट को चुना और जिम्बाब्वे के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो गए।




